Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
इस सुनसान रास्ते पे चलने की, जैसे आदत सी पड़ गयी है| अब सूखी सी इस मिटी पर, जब आशा के फूल खिलते हैं, और इस अंधेरे से भरी दूनिया मे, जब सूरज की किरन पड़ती है, तो गमों को गिनने की, जैसे आदत सी पद गयी है| दूसरों की खुशियों मे अपनी खुशी ढूनडते, येह ज़िंदगी गुज़र गयी है| हर मोड़ पे निराशा का मिलना, हर काम मे आशा का बिखरना, घर से बाहर निकलने के ख्याल पर, हज़ार बार सोचना, इस सोचने के च्कर मे ही, ज़िंदगी गुज़र गयी है|
0
Jul 26, 2015
Jul 26, 2015 at 1:23 PM UTC
आदत
इस सुनसान रास्ते पे चलने की, जैसे आदत सी पड़ गयी है| अब सूखी सी इस मिटी पर, जब आशा के फूल खिलते हैं, और इस अंधेरे से भरी दूनिया मे, जब सूरज की किरन पड़ती है, तो गमों को गिनने की, जैसे आदत सी पद गयी है| दूसरों की खुशियों मे अपनी खुशी ढूनडते, येह ज़िंदगी गुज़र गयी है| हर मोड़ पे निराशा का मिलना, हर काम मे आशा का बिखरना, घर से बाहर निकलने के ख्याल पर, हज़ार बार सोचना, इस सोचने के च्कर मे ही, ज़िंदगी गुज़र गयी है|
My attempt at hindi poetry :)
gaurav-luthra
Written by
Jul 26, 2015
Jul 26, 2015 at 1:23 PM UTC
Request permission to use this poem