मत सोच क्यूँ खामोश मैं,
लिपटा हूँ सत्य के आगोश में।
क्या अनभिज्ञ तू मेरे आचरण से?
पर मैं परिचित तेरे झूठे आवरण से।
उन अंधेरी रातों से भी,
तेरी तुच्छ बातों से भी;
मन में उठ रही लहरों को,
जो खुद रोक दे पहरों को।
उन घृणित निगाहों को—
न भूला कभी उन झूठी,
बेतुकी अपवाहों को।
जो आज मेरे विपरीत है,
कल मेरे साथ थी;
मैं वाकिफ भी उन हवाओं से,
नदियों के किलोल से,
पर्वतों की ढाल से।
मैं परिचित भी हूँ
उस वक्त की भाल से;
मैं परिचित पेड़ों की छाँव से,
शब्दों से मिले घाव से,
तुम्हारे बदलते लहजों के भाव से।
मैं वाकिफ तीरों की बरसात से,
उस रक्तरंजित प्रभात से,
हर वक्त मिले घात से;
सौंदर्य से भी श्रेष्ठ उस चांदनी रात से।
वंचित भी नहीं, तो पास भी नहीं;
मैं अनभिज्ञ कहाँ उन छली सवालात से—
बस मैं मजबूर भी हूँ
तो बस एक हालात से।
प्रतिशोध की ज्वाला के भी ताप से,
स्वयं अपने आप से,
अतीत की छाप से,
वर्तमान की माप से;
मैं परिचित भी हूँ
उस भविष्य के क्रियाकलाप से।
रवि के ताप से,
चंद्र के तेज से,
पक्षियों के कलरव से भी,
तो सिंह की नाद से;
खेतों के उन कूड़ से,
तो नदियों में जमी उस भूड़ से;
परिचित मैं झूठी शान से,
तो तेरे झूठे उस अभिमान से।
मैं परिचित खेतों और कुओँ से,
तो परिचित उस खलिहान से।
मैं कहाँ अनभिज्ञ तुम्हारे
मन में लगी उस कृशानु से;
मैं सदा परिचित तुम्हारे अनुमान से।
Dec 28, 2025
Dec 28, 2025 at 12:47 PM UTC
मत सोच क्यूँ खामोश मैं,
लिपटा हूँ सत्य के आगोश में।
क्या अनभिज्ञ तू मेरे आचरण से?
पर मैं परिचित तेरे झूठे आवरण से।
उन अंधेरी रातों से भी,
तेरी तुच्छ बातों से भी;
मन में उठ रही लहरों को,
जो खुद रोक दे पहरों को।
उन घृणित निगाहों को—
न भूला कभी उन झूठी,
बेतुकी अपवाहों को।
जो आज मेरे विपरीत है,
कल मेरे साथ थी;
मैं वाकिफ भी उन हवाओं से,
नदियों के किलोल से,
पर्वतों की ढाल से।
मैं परिचित भी हूँ
उस वक्त की भाल से;
मैं परिचित पेड़ों की छाँव से,
शब्दों से मिले घाव से,
तुम्हारे बदलते लहजों के भाव से।
मैं वाकिफ तीरों की बरसात से,
उस रक्तरंजित प्रभात से,
हर वक्त मिले घात से;
सौंदर्य से भी श्रेष्ठ उस चांदनी रात से।
वंचित भी नहीं, तो पास भी नहीं;
मैं अनभिज्ञ कहाँ उन छली सवालात से—
बस मैं मजबूर भी हूँ
तो बस एक हालात से।
प्रतिशोध की ज्वाला के भी ताप से,
स्वयं अपने आप से,
अतीत की छाप से,
वर्तमान की माप से;
मैं परिचित भी हूँ
उस भविष्य के क्रियाकलाप से।
रवि के ताप से,
चंद्र के तेज से,
पक्षियों के कलरव से भी,
तो सिंह की नाद से;
खेतों के उन कूड़ से,
तो नदियों में जमी उस भूड़ से;
परिचित मैं झूठी शान से,
तो तेरे झूठे उस अभिमान से।
मैं परिचित खेतों और कुओँ से,
तो परिचित उस खलिहान से।
मैं कहाँ अनभिज्ञ तुम्हारे
मन में लगी उस कृशानु से;
मैं सदा परिचित तुम्हारे अनुमान से।
