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हमारा पहुँचना क़ब्रिस्तान महस था एक इत्तिफ़ाक़ देखा मुतवफफी लहद में लेटे थे छोड़कर आफ़ाक़ आसमान में डूबते सूरज कि बिखरती लाली ये कहे परिंदे लौट आए अपने घोसले भूलकर सब निफाक़ चारो ओर उदासी छाई हूवी थी, चहरे थे फ़िक्री जानेवालो कि सिफ्र रहजाएगी यादो के औराक़ करोना का अजीब दौर था जब मौत होगई थी सस्ती सारी आवाम सब्र का घूँट पीकर, तस्लीम किए फ़िराक मरज़ हो जाए ख़त्म ओर नया इलाज होग़ा ईजाद तभी तो इन्सान पाएगा अमन और विफाक़
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Feb 13, 2021
Feb 13, 2021 at 9:52 PM UTC
इत्तिफ़ाक़
हमारा पहुँचना क़ब्रिस्तान महस था एक इत्तिफ़ाक़ देखा मुतवफफी लहद में लेटे थे छोड़कर आफ़ाक़ आसमान में डूबते सूरज कि बिखरती लाली ये कहे परिंदे लौट आए अपने घोसले भूलकर सब निफाक़ चारो ओर उदासी छाई हूवी थी, चहरे थे फ़िक्री जानेवालो कि सिफ्र रहजाएगी यादो के औराक़ करोना का अजीब दौर था जब मौत होगई थी सस्ती सारी आवाम सब्र का घूँट पीकर, तस्लीम किए फ़िराक मरज़ हो जाए ख़त्म ओर नया इलाज होग़ा ईजाद तभी तो इन्सान पाएगा अमन और विफाक़
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Feb 13, 2021
Feb 13, 2021 at 9:52 PM UTC
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