किस चित्रकार की शैली है,,खेतों में रंगत फैली है,
कई रंग उभर कर आए हैं ,मनभावन दृश्य लाए है,
*हर कोई न कर सकता, किसान की पहेली है।।
ये सरसों के पीले फूलों पर पराग भी आए है,
कुछ भंवरे भी इनसे मिलने आए है "
एक प्यारी सी महक छायी है "
बड़ी मनोरम रुत आयी है ,,
एक तो हरियाली, ऊपर से पीली चादर छायी है "
खेतों में जान, मानो फिर लौट आयी है ,,
मानो पहले तो ये सूरज को भी लपकेगी "
फिर समझ कर कुछ धरती के चरण चूमेगी ।।
फिर हवाओं का पहर चलता है,
फिर दिन भी यू कुछ ढलता है,
रात अंधेरी सी, कोहरा कुछ यू छाया है,
रक्षा में फिर इनकी खुद धरतीपुत्र आया है ||
संतान की भांति पोषित करता,
मानो पिता का फर्ज निभाता है,
रोज निहारा करता , हाथों से सहलाया करता है,
पर हालातों का मारा, खुद भूखा सो जाया करता है ||
फ़िर पेड़ो पर फलिया आयी है,,
जो उसने उम्मीद लगायी है,,
फिर संघर्ष का दौर यू चलता है ,
ये मौसम का रूठापन खलता है ।।
चिंता में जिसको नींद न आती, खेतों का पहरा देता है "
ये बेमौसम बारिश आजाना , उसको ठहरा देता है,,
बैठा रहता है रात भर बस अलाप ही उसका सहारा है "
लेता है, एक कश चिलम कि सपनों में खो जाता है ,,
इस कठिन घड़ी में भी , अपनी फसल की रक्षा करता है,,
भय भी प्रतीत सा होता, मन विचलित कर जाती हैं "
जब आसमान में ये काली घटाए छाती है,,
इन ठंडी सुर्ख हवाओ में, इन काली घटाओ में "
चांद भी छिप जाता है, पर वो पहरा लगाता है ।।
इतनी मेहनत और कठिनाई से जो भी पाता है "
क्या लिखा लेख ऐसा उसने, वो कैसी भयमाता है ,,
फिर भी वो मन में संतुष्टि लाता है,
भूल कर अतीत भविष्य में चला जाता है ।।
पहले से कुछ अच्छा करने की उसने ठानी है,,
झेलकर भी बेमौसम की मार उसने हार कहा मानी है ।।
इस बार फ़िर कुछ नया वो उपजायेगा "
सोचता है कभी वक्त भी उसका आयेगा ।।
रुका नहीं कभी वो न कभी हार स्वीकारी है,
खेतों में उकेरा करता अक्सर वो उसकी चित्रकारी है ।।
उनकी इस मेहनत पर मेरा लेखन जारी है,,
मैं हि क्या, पूरा देश जिनका आभारी है ।।
जो हर वक्त खड़ा चट्टान की भांति कूड़ कूड़ सजाता है
जिसे कोई कहता किसान, और धरतीपुत्र कहलाता है।।
By Mr. नितिन कुमार मीना
Belong to the great village mohacha
✍🏻 ✍🏻
*For my _ Nation_backbone
Nov 4, 2025
Nov 4, 2025 at 10:45 PM UTC
किस चित्रकार की शैली है,,खेतों में रंगत फैली है,
कई रंग उभर कर आए हैं ,मनभावन दृश्य लाए है,
*हर कोई न कर सकता, किसान की पहेली है।।
ये सरसों के पीले फूलों पर पराग भी आए है,
कुछ भंवरे भी इनसे मिलने आए है "
एक प्यारी सी महक छायी है "
बड़ी मनोरम रुत आयी है ,,
एक तो हरियाली, ऊपर से पीली चादर छायी है "
खेतों में जान, मानो फिर लौट आयी है ,,
मानो पहले तो ये सूरज को भी लपकेगी "
फिर समझ कर कुछ धरती के चरण चूमेगी ।।
फिर हवाओं का पहर चलता है,
फिर दिन भी यू कुछ ढलता है,
रात अंधेरी सी, कोहरा कुछ यू छाया है,
रक्षा में फिर इनकी खुद धरतीपुत्र आया है ||
संतान की भांति पोषित करता,
मानो पिता का फर्ज निभाता है,
रोज निहारा करता , हाथों से सहलाया करता है,
पर हालातों का मारा, खुद भूखा सो जाया करता है ||
फ़िर पेड़ो पर फलिया आयी है,,
जो उसने उम्मीद लगायी है,,
फिर संघर्ष का दौर यू चलता है ,
ये मौसम का रूठापन खलता है ।।
चिंता में जिसको नींद न आती, खेतों का पहरा देता है "
ये बेमौसम बारिश आजाना , उसको ठहरा देता है,,
बैठा रहता है रात भर बस अलाप ही उसका सहारा है "
लेता है, एक कश चिलम कि सपनों में खो जाता है ,,
इस कठिन घड़ी में भी , अपनी फसल की रक्षा करता है,,
भय भी प्रतीत सा होता, मन विचलित कर जाती हैं "
जब आसमान में ये काली घटाए छाती है,,
इन ठंडी सुर्ख हवाओ में, इन काली घटाओ में "
चांद भी छिप जाता है, पर वो पहरा लगाता है ।।
इतनी मेहनत और कठिनाई से जो भी पाता है "
क्या लिखा लेख ऐसा उसने, वो कैसी भयमाता है ,,
फिर भी वो मन में संतुष्टि लाता है,
भूल कर अतीत भविष्य में चला जाता है ।।
पहले से कुछ अच्छा करने की उसने ठानी है,,
झेलकर भी बेमौसम की मार उसने हार कहा मानी है ।।
इस बार फ़िर कुछ नया वो उपजायेगा "
सोचता है कभी वक्त भी उसका आयेगा ।।
रुका नहीं कभी वो न कभी हार स्वीकारी है,
खेतों में उकेरा करता अक्सर वो उसकी चित्रकारी है ।।
उनकी इस मेहनत पर मेरा लेखन जारी है,,
मैं हि क्या, पूरा देश जिनका आभारी है ।।
जो हर वक्त खड़ा चट्टान की भांति कूड़ कूड़ सजाता है
जिसे कोई कहता किसान, और धरतीपुत्र कहलाता है।।
By Mr. नितिन कुमार मीना
Belong to the great village mohacha
✍🏻 ✍🏻
*For my _ Nation_backbone
