क्यों बार-बार तुम हँसी में
उन सुंदर नथुनों को यूँ फैलाती हो?
हर साँस जैसे एक निमंत्रण देती है,
एक फुसफुसाहट जो मुझे तुम्हारे करीब बुलाती है—
जैसे तुम्हारी रूह मेरी रूह को पुकार रही हो।
Oct 14, 2025
Oct 14, 2025 at 10:40 PM UTC
क्यों बार-बार तुम हँसी में
उन सुंदर नथुनों को यूँ फैलाती हो?
हर साँस जैसे एक निमंत्रण देती है,
एक फुसफुसाहट जो मुझे तुम्हारे करीब बुलाती है—
जैसे तुम्हारी रूह मेरी रूह को पुकार रही हो।
