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देखकर उन बया के घास के महलों को, मन में उमंग फिर से जुड़ने की जगी थी। जब उन सूखे कुओं पर आज मैं गया था, उसके ढ़ाने पर बैठकर मन में एक दुख हुआ। ऐसा भी क्या हुआ, जो आज सूखी पड़ी ये विरासत है? जिसने खेतों को सींचा था कभी, वो क्यूँ सूखे पड़े हैं अभी? जिन पर चहल-पहल हमेशा रहती थी, वो चरस के पानी में डुबकी लेने की आवाज भी कुछ कहती थी। जो शान हमेशा खेतों की थे, मेहनत बड़े बुजुर्गों की थे— एक साथ कई बैलों की जोड़ी पानी खींचा करती थी, मिलकर किसानों के साथ उन फसलों को सींचा करती थी। बैठकर मेरे बुजुर्ग उस कोठी के ढ़ाने पर, बैठा करते थे मिलकर सबके साथ खाने पर। पूरी विरासत टिकी थी बस कुछ आने पर। उस वक्त सभी के खेतों का एक खलिहान हुआ करता था, आपस में सबका मिल-जुल कर रहना दिल छूआ करता था। मेडों की ओट से पानी फसल पिया करती थी, वो अपनी गुजर चुकी पीढ़ियाँ जो ये सब जिया करती थी। आज मैं बस कुछ सुने हुए किस्सों को, तो कुछ खुद जिए हुए जीवन के हिस्सों को— आज कुछ पंक्तियों में अपने लिए गढ़ रहा हूँ। आज जब मैं उन सुनसान पड़ी विरासत को निहारता हूँ, बस कल्पनाओं में खोकर हमेशा ही हारता हूँ। वो वक्त, जब मैं खुद इन कोठी के ढ़ानों पर जाता था, वो वक्त मेरे बचपन का था— बस उस वक्त भी सुकून बड़ा मुझे मिलता था। देखकर वो पानी मेडों में, मन मेरा खिलता था। बैठकर उन कदंब की डालों पर गन्ने हमने चूसे थे। आज भी सुकून उन कदंब की छाँव में मिलता है, बस देखकर इन कदंब कुंजों को मेरा मन हमेशा किसी शुभ अतीत से मिलता है। यही तो वो निशानी मेरे गाँव की है— ये उस वक्त भी मौजूद थे और आज भी मौजूद हैं। बस यही हकीकत कहो या कहानी— मेरे गाँव की है।
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Jan 6
Jan 6, 2026 at 2:00 AM UTC
सूखी विरासत की सिसकियाँ
देखकर उन बया के घास के महलों को, मन में उमंग फिर से जुड़ने की जगी थी। जब उन सूखे कुओं पर आज मैं गया था, उसके ढ़ाने पर बैठकर मन में एक दुख हुआ। ऐसा भी क्या हुआ, जो आज सूखी पड़ी ये विरासत है? जिसने खेतों को सींचा था कभी, वो क्यूँ सूखे पड़े हैं अभी? जिन पर चहल-पहल हमेशा रहती थी, वो चरस के पानी में डुबकी लेने की आवाज भी कुछ कहती थी। जो शान हमेशा खेतों की थे, मेहनत बड़े बुजुर्गों की थे— एक साथ कई बैलों की जोड़ी पानी खींचा करती थी, मिलकर किसानों के साथ उन फसलों को सींचा करती थी। बैठकर मेरे बुजुर्ग उस कोठी के ढ़ाने पर, बैठा करते थे मिलकर सबके साथ खाने पर। पूरी विरासत टिकी थी बस कुछ आने पर। उस वक्त सभी के खेतों का एक खलिहान हुआ करता था, आपस में सबका मिल-जुल कर रहना दिल छूआ करता था। मेडों की ओट से पानी फसल पिया करती थी, वो अपनी गुजर चुकी पीढ़ियाँ जो ये सब जिया करती थी। आज मैं बस कुछ सुने हुए किस्सों को, तो कुछ खुद जिए हुए जीवन के हिस्सों को— आज कुछ पंक्तियों में अपने लिए गढ़ रहा हूँ। आज जब मैं उन सुनसान पड़ी विरासत को निहारता हूँ, बस कल्पनाओं में खोकर हमेशा ही हारता हूँ। वो वक्त, जब मैं खुद इन कोठी के ढ़ानों पर जाता था, वो वक्त मेरे बचपन का था— बस उस वक्त भी सुकून बड़ा मुझे मिलता था। देखकर वो पानी मेडों में, मन मेरा खिलता था। बैठकर उन कदंब की डालों पर गन्ने हमने चूसे थे। आज भी सुकून उन कदंब की छाँव में मिलता है, बस देखकर इन कदंब कुंजों को मेरा मन हमेशा किसी शुभ अतीत से मिलता है। यही तो वो निशानी मेरे गाँव की है— ये उस वक्त भी मौजूद थे और आज भी मौजूद हैं। बस यही हकीकत कहो या कहानी— मेरे गाँव की है।
मेडों की ओट से पानी फसल पिया करती थी, वो अपनी गुजर चुकी पीढ़ियाँ जो ये सब जिया करती थी।
MrNitinKumarmeena
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Jan 6
Jan 6, 2026 at 2:00 AM UTC
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